औरत बनाम मर्द यानि कांग्रेस बनाम भाजपा

पहली खबर - सोनिया ने मनमोहन को तलब किया [चेतावनी - यहाँ आप समय - समय पर मनमोहन की जगह किसी अन्य केंद्रीय मंत्री या कांग्रेसी मुख्यमंत्री का नाम पा सकते हैं]

दूसरी खबर - राजनाथ ने वसुंधरा को तलब किया [चेतावनी - यहाँ आप समय समय पर भाजपा की किसी अन्य महिला नेत्री का नाम पा सकते हैं]

कहा जाता है कि नेहरु के ऑंखें मूँद लेने के बाद से [यदि आप शास्त्री के कार्य काल के बारे आँखें मूँद लें तो] कांग्रेस में महिलाओं की चली है. इंदिरा गाँधी के बाद वैसे तो राजीव आये पर उनकी नकेल कहते हैं कि सोनिया के हाथ में ठीक उसी तरह थी जैसे जहाँगीर की नकेल नूरजहाँ के हाथ में थी. यहाँ नरसिम्हा राव का भी जिक्र हो सकता है. पर उनकी मशहूर और महान निष्क्रियता के बारे में लोकोक्तियाँ हैं कि उन्हें सोनिया [जो उस समय कथित तौर पर राजनी ति से दूर थी और शोकाकुल अवस्था में थी] के माध्यम से फरमान सुनाये जाते थे. जिनके अनुसार वे काम नहीं करना चाहते थे और सोनिया के फरमान के विपरीत कोई काम हो नहीं सकता था इसलिए नरसिम्हा राव जी घोर निद्रा में लीन रहते थे. इस समय तो देश के बच्चे - बच्चे तो क्या पेड़ - पोधे, यहाँ तक की जर्रे - जर्रे तक को पता है कांग्रेस में किसका शा सन चलता है.

दूसरी और भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी में इसके विपरीत हालात हैं. वहां महिलाओं की दुर्गत की जाती है. ये पार्टी घोषित हिन्दुत्ववादी है और हिन्दू रामायण और महाभारत को मानते हैं और सभी जानते हैं कि रामायण में सीता और महाभारत में द्रोपदी की कैसी छीछालेदर की गयी थी. इस पार्टी ने सबसे पहला काम तो सत्ता में आने पर यह किया कि जिस व्यक्ति ने महिला को अपनी दहलीज भी पार नहीं करने दी उसी को प्रधान मंत्री बनाया. इसके अलावा यहाँ महिलाओं की योग्यता को हमेशा शक की नजरों से देखा जाता है कि कहीं वे द्रौपदी की तरह चीर - हरण करवाने की जगह युधिस्ठिर की तरह पांसे न फेंकने लग पड़ें. इसलिए समय - समय पर नेत्रियों के पर क़तर कर अन्य महिलाओं को चेतावनी दी जाती है कि वे अपनी हद में रहें. लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि इस पार्टी ने मनमोहन को चुनाव के समय इसलिए निशाना बनाया क्योंकि उनकी आवाज महिला जैसी है.


इन दोनों पार्टियों की सभी नीतियाँ चाहे वो देश नीति हो या विदेश नीति, धर्मं नीति हो या अधर्म नीति, व्यापार नीति हो या भ्रष्टाचार नीति, आंतरिक लोकतंत्र नीति हो या बाहरी लोकतंत्र नीति एक जैसी हैं. इसलिए मुझे ये दोनों पार्टियाँ एक जैसी लगती थी फिर भी कुछ सूक्ष्म अंतर था जो समझ में नहीं आ रहा था. परन्तु वसुंधरा राजे के मामले ने मेरे अंतर्मन का दिया जला दिया और मुझे इनका अंतर शीशे की तरह साफ़ नजर आ गया. वैसे हाल ही में दुर्गत तो इस घोर लोकतान्त्रिक पार्टी ने जसवंत सिंह की भी की है पर वो मर्दों का आपसी [वर्चस्व का] मामला है.


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Публикувано от Ханс

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