In continuance of our efforts to show the other side of the story. Today we bring you a letter from a police constable, who refused to take bribe. Do read.
प्रिय मिर्त्रों,
सर्व-प्रथम तो इस वेब-साईट के निर्माता से मेरा विनम्र निवेदन है की इसे हिंदी भाषा में भी उपलब्ध कराएं. क्योंकि अंग्रेजी आम भारतीय की पहुँच से बाहर है. इसके अलावा एक और निवेदन ये है की, एक और स्तम्ब का अनावरण करें – जिसमें “मैंने रिश्वत नहीं ली” और इसी प्रकार की अन्य टिप्पणियाँ दी जा सकें.
खैर अब मैं अपनी आप बीती बतलाता हूँ. मै एक इमानदार पुलिस कोन्स्तिबल हूँ, और अपने उसूल का पक्का हूँ. मैंने जिस किसी काम के लिए भी आज तक रिश्वत ली है, उसे पूरण करके ही दम लिया है. इसके अलावा मैंने आज तक किसी काम की न्याजयज रिश्वत नहीं ली है. अगर आपके काम के १०० रूपये रिश्वत के बनते हैं, तो मैंने हमेशा १०० ही लिए हैं. कभी १०० का १०१ नहीं किया. खैर ये चरित्र चित्रण मैंने इसलिए किया की आपको बतला सकूं की रिश्वत के मामले में मै कितना उसूल का पक्का हूँ.
आज भी दिसम्बर २४ की वो सर्दी भरी रात याद है. रात के तीन बजे होंगे. मै आराम से पुलिस स्टेशन में सो रहा था. तभी अचानक फ़ोन की घंटी बजी. संषेप में बताऊं तो, एक पडोसी ने फ़ोन किया था की एक वृद्ध दम्पति की हत्या हो गयी है. खैर केस काफी साधारण सा था, नौकर ने सोने के गहने और नकद चुराने के एवज में ये हत्या की थी.
इससे पहले आप और आगे पढ़ें, आप से एक प्रशन पूछता हूँ. आपके ख्याल से हमने नौकर से क्या रिश्वत मांगी होगी? या कही हमने चोरी के गहने और नकदी ही तो कहीं हजम नहीं कर ली?
अब आपको और संशय की स्तिथि में ना रखते हुए बता दूं की हम लोगो ने ना ही रिश्वत ली और ना ही गहने हजम किये. अब आप पूछेंगे क्यों? बताता हूँ, बताता हूँ, धीरज रखो.
हम पोलिसे-वालों का ये उसूल है की जो कोई समाज के लिए कोई अच्छा कार्य करता है उससे हम कभी रिश्वत नहीं लेते और ना ही किसी झूटे केस में फंसाते हैं. कम से कम मेरी जानकारी में तो सभी पोलिसे-वाले यही करते हैं.
जैसा की आप लोगो को विदित है, वृद्ध NPA (Non Performing Asset – अर्थशास्त्र से एक परिभाषा लेते हुए) होते हैं, अर्थात वो केवल समाज पर भोझ होते हैं. ख़ास तौर पे भारत सरकार की वर्तमान में अपनाई गयी योजनाओं और बजट में डाले गए प्रस्तावों के बाद तो किसी को भी इस बात में जरा भी संशय नहीं रह गया होगा, की हर एक मृत वृद्ध, एक बालक के चहरे पर मुस्कान ला सकता है.
जितना पैसा सरकार एक वृद्ध पर खर्चती है, उतना सरकार किसी छोटे बच्चे की पढाई पर इस्तेमाल कर सकती है. इसमें देश और समाज दोनों का लाभ है. बुड्ढ़े को स्वर्ग (या नरक) के द्वार पे पंहुचा देना समाज की प्रगति में सहायक है. किस देश में कितने वृद्ध प्रति व्यक्ति मरते हैं ये उस देश की प्रगति का पैमाना भी है.
खैर, इन सब कारणों से हम लोगो ने निर्णय लिया की हम उस नौकर को आजाद जाने देंगे. किसी अच्छे काम के लिए की गयी हत्या, हत्या नहीं पुण्य का कार्य है.
हालांकि हमने उस नौकर को सख्त ताकीद दी की आगे से वो किसी वृद्ध दम्पति की हत्या करने के बाद उनकी लाश को जलाये नहीं, इससे प्रदुषण फैलता है.
एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते प्रदुषण और वैश्विक उष्मीकरण (global warming) को रोकना हमारा कर्तव्य है.
आशा है, इस घटना को पढ़कर आपके मन से कुछ भ्रान्तिया दूर हुई होंगी. पुलिस उतनी बुरी नहीं है जितना उसे समझा जाता है.
आपका,
एक अज्ञात पुलिस-कर्मी.
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